साफ सुथरा इस्तरी किया हुआ कड़कता कपड़ा. जब प्रेस या इस्तरी किसी कपड़ों को गरमाते हुए उसकी सलवटें निकालती है तो कपड़ों में भी मूछों की तरह ताव आ जाता है. वैसे कपड़ों से सलवटें हटाकर पहनने का रिवाज ईसा से पहले का है. क्या आपको मालूम है कि इस्तरी का आविष्कारक कौन था. इसका नाम ये क्यों पड़ा.
हालांकि जेन जी को जो नया फैशन चला है, उसमें वो कपड़ों को प्रेस करने पर विश्वास नहीं करते. मुड़ी तुड़ी जींस और टीशर्ट पहनकर कहीं भी निकल जाते हैं. यही उनका फैशन है लेकिन ज्यादातर लोग बगैर प्रेस किए कपड़े पहन ही नहीं सकते. अगर उन्हें घर से बाहर जाना हो और ऑफिस के लिए निकलना हो तो इस्तरी किए बगैर सलवटों के तमतमाते कपड़े पहनकर ही निकलते हैं. शायद ही कोई घर हो, जहां इस्तरी नहीं हो. पहले भारत में कोयले वाली इस्तरी का चलन था. अब इलैक्ट्रिक प्रेस आ चुकी है.
कपड़े से सिलवटों से निकालने का काम हजारों साल पुराना भी है और दिलचस्प भी. दरअसल कपड़ों से सलवटें हटाकर उसे प्रापर प्रेस करने का काम आज से ईसा पूर्व से हो रहा है. माना जाता है कि 400 ईसा पूर्व में प्राचीन यूनान में लोहे का गर्म बेलन घुमाकर कपड़ों पर प्लेट्स बनाई जाती थी. प्राचीन चीन में लोग धातु की परात में गर्म कोयले भरकर उससे कपड़े चिकने किया करते थे.
भारत में इस्तरी की इंटरेस्टिंग कहानी
भारत में इस्तरी के इस्तेमाल की कहानी दिलचस्प है. ब्रिटिश शासन से पहले भी भारत में कपड़ों को सिलवटों से निकालने के अपने तरीके थे, जो स्थानीय साधनों पर आधारित थे. केरल में पारंपरिक रूप से इस्तरी करने के लिए जलते हुए नारियल के खोल का इस्तेमाल किया जाता था. यह तरीका कोयले से भरे बक्से की तरह ही काम करता था. आज भी कभी-कभी बिजली न होने पर इसे बैकअप के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
आधुनिक इस्तरी अंग्रेज भारत में लेकर आए. एक रिपोर्ट के मुताबिक अंग्रेज़ इस्तरी को लेकर बहुत सख्त थे. उन्हें स्टार्च यानि कपड़ों को सख्त करने वाला लेप बहुत पसंद था. अक्सर उनके कपड़ों को दो-तीन बार प्रेस किया जाता था. खासकर उनकी महिलाओं के प्लेट्स को.
भारत में इस्तरी के इतिहास से जुड़ा रोचक पहलू इसका नाम है. इस्तरी शब्द मूल रूप से भारतीय नहीं है. ये पुर्तगाली भाषा के शब्द एस्टीकर से बना है, जिसका मतलब ‘खींचना’ या ‘तानना’ होता है. माना जाता है कि पुर्तगाली व्यापारी यह उपकरण अपने साथ भारत लाए थे.
ठोस लोहे की प्रेस
8वीं और 9वीं सदी उत्तरी यूरोप में वाइकिंग्स चिकने पत्थरों का उपयोग कपड़ों पर रगड़कर उनकी सलवटें निकालने के लिए किया करते थे. मध्य युग यानि 14वीं शताब्दी में यूरोप में ‘फ्लैट आयरन’ या ‘सैड आयरन’ का उदय हुआ. ‘सैड’ का मतलब पुरानी अंग्रेजी में ‘ठोस’ होता है. यह लोहे का एक ठोस, भारी त्रिकोणीय टुकड़ा होता था जिसे आग पर गर्म करके इस्तेमाल किया जाता था.
अल्कोहल से चलने वाली प्रेस
समय के साथ इस्तरी के डिजाइन में सुधार होता गया. फिर ऐसी प्रेस आई, जो अंदर से खोखले लोह का डिब्बा होता था, इसके अंदर जलता हुआ कोयला भरा जाता था. यह ज़्यादा देर तक गर्म रहता था.जर्मनी में 19वीं सदी में अल्कोहल से चलने वाली इस्तरी बनाई गई. गैस से चलने वाले इस्तरी भी आई, जो एक छोटी टंकी से जुड़ी होती थी. इसी सदी में अमेरिका की मैरी फ्लोरेंस पॉट्स ने एक ऐसा सैड आयरन बनाया जिसका हैंडल चलाया जा सकता था. इसका इस्तेमाल आसान था.
कैसे काम करती थी अल्कोहल से चलने वाली प्रेस
अल्कोहल से चलने वाली प्रेस को “स्पिरिट आयरन” या “अल्कोहल बर्निंग फ्लैट आयरन” कहा जाता था. ये इस्तरी दो मुख्य भागों से बनी होती थी, जिन्हें गर्मी से बचाने वाली सामग्री से अलग किया जाता था. हैंडल के ऊपर या पीछे की तरफ एक गोलाकार या आयताकार धातु का कंटेनर होता था, ये बर्नर के साथ होती थी, इसे जला देते थे. शराब की टंकी से एक पतली ट्यूब इस्तरी के गर्म तले तक जाती थी. ये भाप के तौर पर निकलती थी और कपड़ों को प्रेस करती रहती थी. बर्नर के पास एक छोटा सा कंट्रोल वाल्व होता था, जिसे घुमाकर आप अल्कोहल के प्रवाह को कम या ज्यादा कर सकते थे. इस्तरी के शरीर में कई छोटे-छोटे छेद यानि वेंटिलेशन होल बने होते थे ताकि हवा अंदर आ सके और ज्वाला को ऑक्सीजन मिलती रहे.
अल्कोहल से चलने वाली प्रेस. (फाइल फोटो)
ये प्रक्रिया बहुत असरदार थी. अल्कोहल की भाप बनती थी. जिससे भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती थी, जो फ्लैट आयरन को तीन मिनट में गर्म कर देती थी. इसमें बर्नर और अल्कोहल की स्थिति को इस तरह कंट्रोल करते थे कि आग लगने की कोई गुंजाइश नहीं रहती थी. ये कोयले से हल्की थी. जल्दी गर्म हो जाती थी लेकिन समस्या ये थी कि अल्कोहल महंगा था. एक शर्ट प्रेस करने में भी काफी ईंधन लग जाता था.
इस तकनीक का पेटेंट भी कराया गया था. इसका आविष्कार जर्मनी के जोसेफ फेल्डमेयर ने किया था. ये इस्तरी यूरोप से लेकर अमेरिका तक में फेमस हो गई थी. जब सुरक्षित और सस्ती बिजली की प्रेस आ गई तो ये धीरे-धीरे बाजार से गायब हो गईं.
फिर आई बिजली की प्रेस
19वीं सदी के अंत में बिजली की प्रेस का आविष्कार हुआ है. इसके आविष्कारकर्ता अमेरिका के हेनरी डब्ल्यू. सीली थे. उन्होंने इसे 6 जून, 1882 को पेटेंट कराया. हालांकि, यह शुरुआती मॉडल काफी भारी था. इसे गर्म होने में देर लगाती थी. पहला स्टीम आयरन न्यूयॉर्क की एक कंपनी एल्डेक ने 1926 में बनाई. ये शुरू में सफल नहीं हुई लेकिन अब ये लोकप्रिय है.
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